रांची: के मेदांता अस्पताल से जुड़ा एक मामला मरीजों के इलाज और अस्पताल की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। 75 वर्षीय पूर्व आईपीएस अधिकारी मदन मोहन ओझा की मौत के मामले में उनके बेटे निशांत शेखर ने अस्पताल और डॉक्टरों पर इलाज में लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए हैं। मामले में अदालत की ओर से भी दो डॉक्टरों के खिलाफ संज्ञान लिया गया है।
परिवार का आरोप- समय पर नहीं मिला जरूरी इलाज
परिजनों के मुताबिक, मदन मोहन ओझा अस्पताल सीने में दर्द, सांस लेने में परेशानी और बेचैनी जैसी गंभीर शिकायतों के साथ पहुंचे थे। परिवार का आरोप है कि उन्हें तत्काल कार्डियक इमरजेंसी या आईसीयू में भर्ती नहीं किया गया, जबकि उनकी स्थिति गंभीर थी। परिजनों ने यह भी सवाल उठाया है कि मरीज को पहले हार्ट अटैक हो चुका था, इसके बावजूद उसकी गंभीर स्थिति का आकलन किस स्तर पर किया गया। परिवार का आरोप है कि आईसीयू में भर्ती कराने की मांग के बावजूद उनकी बात को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया।
पुराने मामले में भी डॉक्टर पर लगा था लापरवाही का आरोप
मेदांता से जुड़ा यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसी अस्पताल में इलाज के दौरान एक महिला की मौत के पुराने मामले में भी परिवार ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाया था। महिला के बेटे मोहम्मद शमीम ने इस संबंध में ओरमांझी थाना में लिखित शिकायत दी थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, महिला को सीने में दर्द, सांस लेने में परेशानी और गंभीर डायबिटीज की शिकायत थी। उन्हें 13 सितंबर को कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. नीरज प्रसाद की देखरेख में भर्ती कराया गया था और क्रिटिकल केयर यूनिट में इलाज चल रहा था। परिवार ने आरोप लगाया था कि उनकी मां को उचित इलाज नहीं मिला, जिसके कारण उनकी मौत हुई। हालांकि, अस्पताल की ओर से इन आरोपों को खारिज किया गया था।
एक डॉक्टर का नाम, दो अलग-अलग मामले
दोनों मामलों में सामने आए आरोपों के बीच डॉ. नीरज प्रसाद का नाम भी चर्चा में आया है। एक ओर मदन मोहन ओझा की मौत के मामले में परिवार ने इलाज में देरी और उचित चिकित्सा सुविधा नहीं मिलने के आरोप लगाए हैं, वहीं पुराने मामले में भी डॉक्टर और अस्पताल पर लापरवाही के आरोप लगाए गए थे। हालांकि, दोनों मामलों की परिस्थितियां अलग हैं और पुराने मामले में अस्पताल ने आरोपों को स्वीकार नहीं किया था।
अब उठ रहे हैं ये बड़े सवाल
मदन मोहन ओझा के मामले ने निजी अस्पतालों में मरीजों की प्राथमिकता और आपातकालीन इलाज की व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या गंभीर लक्षणों वाले मरीज की स्थिति का तत्काल आकलन किया गया था? क्या उसे समय रहते कार्डियक इमरजेंसी या आईसीयू में भर्ती किया जाना चाहिए था? परिजनों की आईसीयू में भर्ती की मांग पर क्या उचित कार्रवाई हुई? और सबसे अहम सवाल—क्या CGHS जैसे सरकारी स्वास्थ्य कवरेज वाले मरीजों को भी अन्य मरीजों के समान प्राथमिकता और चिकित्सा सुविधा मिलती है?
इन सवालों का जवाब जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आगे बढ़ने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
फिलहाल मामला सिर्फ एक परिवार की शिकायत तक सीमित नहीं है। इसने अस्पतालों में गंभीर मरीजों की तत्काल पहचान, आपातकालीन इलाज और मरीजों के साथ समान व्यवहार को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है। मरीज अस्पताल में सिर्फ इलाज की उम्मीद लेकर नहीं जाता, बल्कि डॉक्टर और अस्पताल की व्यवस्था पर भरोसा करके जाता है। ऐसे में उस भरोसे को बनाए रखना स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।