बोकारो वन भूमि घोटाला: CID के शिकंजे में मुख्य आरोपी शैलेश कुमार सिंह, फर्जी दस्तावेजों से करोड़ों की जमीन बिक्री का आरोप

Mahak Kumari
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रांची: झारखंड के चर्चित बोकारो वन भूमि घोटाले में सीआईडी (CID) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपियों में शामिल शैलेश कुमार सिंह को पटना से गिरफ्तार कर लिया है। गिरफ्तारी के बाद उसे रांची लाया गया, जहां अदालत में पेशी के बाद न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। इस बहुचर्चित मामले की जांच फिलहाल सीआईडी और प्रवर्तन निदेशालय (ED) दोनों एजेंसियां कर रही हैं।

जांच के दौरान सामने आया है कि बोकारो जिले के तेतुलिया मौजा स्थित लगभग 103 एकड़ संरक्षित वन भूमि को फर्जी दस्तावेजों के जरिए निजी जमीन बताकर करोड़ों रुपये में बेचने की साजिश रची गई। सीआईडी के अनुसार, इस पूरे मामले में शैलेश कुमार सिंह की भूमिका बेहद अहम रही है।

बताया गया है कि आरोपी ने इजहार अंसारी और अख्तर अंसारी से पावर ऑफ अटॉर्नी हासिल की थी। इसके बाद कथित तौर पर जाली कागजात तैयार कर संरक्षित वन भूमि की अवैध खरीद-बिक्री की गई। जांच एजेंसी का दावा है कि आरोपी के खिलाफ फर्जीवाड़ा, आपराधिक साजिश और सरकारी जमीन की अवैध बिक्री के पर्याप्त सबूत मिले हैं।

ईडी की जांच में वित्तीय अनियमितताओं का भी खुलासा हुआ है। एजेंसी के मुताबिक, उमायुष मल्टीकॉम प्राइवेट लिमिटेड ने इस जमीन को सरकारी सर्किल रेट से करीब 11 गुना अधिक कीमत पर बेचा। जहां सरकारी दर 50 हजार रुपये प्रति डिसमिल थी, वहीं खरीदारों से लगभग 5.50 लाख रुपये प्रति डिसमिल तक वसूले गए। कई दस्तावेजों में वास्तविक भुगतान से कम राशि दर्ज करने के भी आरोप सामने आए हैं।

जांच में जमीन के स्वामित्व से जुड़े दस्तावेजों पर भी गंभीर सवाल उठे हैं। इजहार अंसारी ने दावा किया था कि उनके दादा समिरुद्दीन अंसारी ने वर्ष 1933 में सरकारी नीलामी के जरिए यह जमीन खरीदी थी। हालांकि जांच में पता चला कि उस समय उनकी उम्र महज 9 वर्ष 5 महीने थी, जिससे पूरे दावे की विश्वसनीयता संदिग्ध हो गई।

तीन सदस्यीय जांच समिति ने रिकॉर्ड रूम की जांच के दौरान कई अहम दस्तावेज गायब पाए। वर्ष 1993 के रिकॉर्ड के कई पन्ने फटे मिले, जबकि एक सेल सर्टिफिकेट पर वर्ष 2025 की भविष्य की तारीख दर्ज थी। पुरुलिया निबंधक कार्यालय से रिकॉर्ड मंगाने पर भी संबंधित दस्तावेज उपलब्ध नहीं मिले।

जांच एजेंसियों का कहना है कि यह वही वन भूमि है जिसे पहले बोकारो स्टील प्लांट ने वन विभाग को वापस सौंप दिया था। आरोप है कि भू-माफियाओं और कुछ सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से फर्जी दस्तावेज तैयार कर इस सरकारी जमीन की अवैध बिक्री की गई। मामले की प्राथमिकी बोकारो वन प्रमंडल के प्रभारी वनपाल सह वनरक्षक रुद्र प्रताप सिंह की शिकायत पर दर्ज हुई थी।

फिलहाल सीआईडी इस घोटाले में शामिल अन्य संदिग्धों, भू-माफियाओं, अंचल कार्यालय के कर्मचारियों और कुछ अधिकारियों की भूमिका की भी गहन जांच कर रही है। जांच एजेंसियों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस मामले में कई और बड़े खुलासे हो सकते हैं।

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