रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी को विभाग की अवैध कार्रवाई के कारण सेवा से बाहर किया गया है, तो उसका नुकसान कर्मचारी को नहीं उठाना पड़ेगा। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में ‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता।
यह मामला सड़क निर्माण विभाग के कर्मचारी अमरेश कुमार झा से जुड़ा है। विभाग ने 13 नवंबर 2017 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए उन्होंने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के बाद वर्ष 2021 में हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया और अमरेश कुमार झा को सेवा में बहाल करने का आदेश दिया। राज्य सरकार ने इस फैसले को पहले हाईकोर्ट की खंडपीठ और फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन दोनों जगह सरकार को राहत नहीं मिली।
इसके बाद नवंबर 2023 में विभाग ने अमरेश कुमार झा को सेवा में तो बहाल कर लिया, लेकिन वर्ष 2017 से 2023 तक की अवधि को ‘नो वर्क, नो पे’ मानते हुए छह वर्षों का वेतन और अन्य सेवा लाभ देने से इनकार कर दिया।
इस पर दोबारा सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति दीपक रोशन की एकल पीठ ने विभाग के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि जब कर्मचारी की बर्खास्तगी ही अवैध घोषित हो चुकी है, तो यह माना जाएगा कि वह पूरे समय सेवा में ही था। कर्मचारी अपनी इच्छा से काम पर अनुपस्थित नहीं था, बल्कि विभाग की गलत कार्रवाई के कारण वह ड्यूटी नहीं कर सका। इसलिए उसके मामले में ‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत लागू नहीं होगा।
हाईकोर्ट के इस फैसले को राज्य के सरकारी कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी नजीर माना जा रहा है। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि विभाग की मनमानी या अवैध कार्रवाई का आर्थिक नुकसान किसी कर्मचारी पर नहीं थोपा जा सकता।