Ranchi: झारखंड में भाषाई पहचान और रोजगार के अधिकार को लेकर लंबे समय से चल रही बहस एक बार फिर तेज हो गई है। झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) में भोजपुरी, मगही और अंगिका भाषाओं को शामिल करने के मुद्दे पर सरकार द्वारा गठित पांच सदस्यीय मंत्रियों की कमेटी ने सोमवार को पहली बार बैठक की। प्रोजेक्ट भवन में आयोजित इस अहम बैठक में कार्मिक और शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।
सरकार की इस पहल को सिर्फ प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि राज्य के बदलते सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को साधने की कोशिश माना जा रहा है। खासकर बिहार सीमा से जुड़े जिलों में रहने वाले युवाओं की नजरें इस फैसले पर टिकी हुई हैं।
सीमावर्ती जिलों के युवाओं की मांग तेज
झारखंड के कई सीमावर्ती इलाकों में भोजपुरी, मगही और अंगिका बोलने वाली बड़ी आबादी रहती है। इन भाषाओं को जेटेट में शामिल नहीं किए जाने से युवाओं में लंबे समय से नाराजगी है। उनका कहना है कि भाषा के आधार पर उन्हें रोजगार के अवसरों से वंचित किया जा रहा है।
सरकार ने साधा राजनीतिक संतुलन
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार ने कमेटी गठन में क्षेत्रीय और राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है। समिति में मंत्री दीपिका पांडेय सिंह, राधाकृष्ण किशोर, संजय यादव, योगेंद्र प्रसाद और सुदिव्य कुमार सोनू को शामिल किया गया है।
अस्मिता और अधिकार के बीच फंसा मुद्दा
झारखंड में भाषा का सवाल हमेशा से भावनात्मक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है। एक पक्ष क्षेत्रीय और आदिवासी भाषाओं को प्राथमिकता देने की मांग कर रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सीमावर्ती जिलों के युवाओं के रोजगार अधिकार की बात उठा रहा है। ऐसे में सरकार के सामने दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती माना जा रहा है।