रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों से जुड़े चार अलग-अलग मामलों की सुनवाई करते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच मतभेद, लंबे समय तक अलग रहना या एक-दूसरे पर लगाए गए अप्रमाणित आरोप तलाक का पर्याप्त आधार नहीं माने जा सकते। कोर्ट ने कहा कि विवाह एक कानूनी और सामाजिक संस्था है, जिसे समाप्त करने के लिए कानून में निर्धारित कारणों को विश्वसनीय साक्ष्यों के साथ साबित करना अनिवार्य है।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने चार अलग-अलग अपीलों पर सुनवाई करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसलों को बरकरार रखा। इन मामलों में पतियों ने तलाक की मांग की थी, लेकिन निचली अदालतों ने पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलने के कारण याचिकाएं खारिज कर दी थीं।
24 साल पुराने वैवाहिक विवाद में भी नहीं मिले प्रमाण
जमशेदपुर से जुड़े एक मामले में पति-पत्नी का विवाह वर्ष 1987 में हुआ था और दोनों वर्ष 2002 से अलग रह रहे थे। पति ने पत्नी पर अवैध संबंध और मानसिक क्रूरता जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। हालांकि सुनवाई के दौरान वह इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेज, प्रत्यक्ष गवाह या विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सका। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल आशंका या व्यक्तिगत धारणा के आधार पर व्यभिचार जैसे आरोप स्वीकार नहीं किए जा सकते।
शादी के तुरंत बाद अलगाव, फिर भी नहीं मिला तलाक
रांची के एक अन्य मामले में विवाह के करीब एक महीने बाद ही पति-पत्नी अलग रहने लगे थे। पति ने पत्नी के व्यवहार को असामान्य और हिंसक बताते हुए तलाक की मांग की। लेकिन अदालत ने पाया कि आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे। कोर्ट ने कहा कि केवल वैवाहिक जीवन का असफल होना तलाक का स्वतः आधार नहीं बनता।
धनबाद मामले में परित्याग का दावा साबित नहीं हुआ
धनबाद के एक प्रकरण में पति ने आरोप लगाया कि पत्नी शादी के कुछ ही समय बाद घर छोड़कर चली गई और झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकी देती रही। अदालत ने कहा कि परित्याग साबित करने के लिए घटनाओं, परिस्थितियों और गवाहों की आवश्यकता होती है। केवल मौखिक आरोपों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता।
क्रूरता के आरोप भी कानूनी जांच में कमजोर पड़े
चौथे मामले में पति ने पत्नी पर मानसिक और शारीरिक क्रूरता का आरोप लगाया था। हालांकि अदालत ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद पाया कि आरोप कानूनी मानकों पर खरे नहीं उतरते। इस वजह से तलाक की मांग को स्वीकार नहीं किया गया।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि पारिवारिक मामलों में न्यायालय भावनात्मक दावों या व्यक्तिगत धारणाओं के बजाय कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देता है। कोर्ट ने यह भी माना कि बिना प्रमाण किसी जीवनसाथी पर व्यभिचार जैसे गंभीर आरोप लगाना स्वयं मानसिक उत्पीड़न की श्रेणी में आ सकता है।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत केवल वर्षों तक अलग रहना या रिश्तों में कड़वाहट आ जाना तलाक का स्वतः वैधानिक आधार नहीं है। यदि कोई पक्ष क्रूरता, व्यभिचार या परित्याग का दावा करता है, तो उसे अदालत में ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के माध्यम से साबित करना होगा। यह फैसला वैवाहिक विवादों में साक्ष्य की अहमियत को रेखांकित करता है और बताता है कि केवल आरोपों के आधार पर विवाह संबंध समाप्त नहीं किए जा सकते।