रांची: झारखंड के गुमला में वर्ष 2018 से लापता छह वर्षीय बच्ची का अब तक पता नहीं चलने पर झारखंड हाईकोर्ट ने मामले में सख्ती दिखाई है। मंगलवार को हुई सुनवाई में अदालत ने राज्य सरकार से जांच की प्रक्रिया और अधिकारियों की भूमिका को लेकर सवाल किए। साथ ही, प्रार्थी को सरकार के जवाब पर अपना पक्ष रखने के लिए प्रतिउत्तर दाखिल करने का निर्देश दिया। न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सरकार से यह भी पूछा कि बच्ची की तलाश के दौरान अनुसंधान की समय-समय पर तैयार होने वाली रिपोर्ट जिला विधिक सेवा प्राधिकार यानी DLSA, गुमला को भेजी गई थी या नहीं।
जांच में लापरवाही के आरोप
सुनवाई के दौरान प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता शशांक शेखर ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार के शपथ पत्र में वर्ष 2018 से 2022 के बीच पदस्थापित तत्कालीन पुलिस अधीक्षक और जांच अधिकारी को क्लीन चिट दी गई है। प्रार्थी पक्ष ने प्राथमिकी दर्ज करने में कथित देरी और जांच में लापरवाही का मुद्दा उठाया। अधिवक्ता ने यह भी सवाल उठाया कि सरकार की ओर से बच्ची की तलाश में अब तक हुई कार्रवाई और मौजूदा स्थिति की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है। ऐसे में बच्ची की बरामदगी को लेकर पुलिस की कोशिशों पर सवाल बने हुए हैं।
मुख्य आरोपी के परीक्षण की रिपोर्ट का जिक्र
अदालत में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने बताया कि मामले की मुख्य आरोपी भूखली लकड़ा का गुजरात के गांधीनगर में सस्पेक्ट डिटेक्शन टेस्ट कराया गया था। सरकार के अनुसार, परीक्षण में वह संदिग्ध पाई गई। इससे पहले स्वास्थ्य संबंधी कारणों से नार्को टेस्ट नहीं हो पाने की जानकारी दी गई थी। इसके बाद सस्पेक्ट डिटेक्शन टेस्ट सहित दो पूरक परीक्षण कराए गए थे।
मां ने हाईकोर्ट में दायर की है याचिका
यह मामला सितंबर 2018 में गुमला से लापता हुई छह वर्षीय बच्ची से जुड़ा है। लंबे समय तक बच्ची का कोई सुराग नहीं मिलने पर उसकी मां चंद्रमुनि उराइन ने झारखंड हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हेबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की थी। इस याचिका के जरिए बच्ची को खोजकर बरामद करने की मांग की गई है। हाईकोर्ट इस मामले की लगातार निगरानी कर रहा है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार अगली सुनवाई में जांच की प्रगति और बच्ची की तलाश को लेकर क्या जानकारी देती है।