एडमिशन के साथ बढ़ा ‘कमिशन नेटवर्क’, किताब-ड्रेस-बस फीस में अभिभावकों पर बोझ

Mahak Kumari
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रांची: राजधानी रांची सहित राज्यभर में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही निजी स्कूलों में खर्चों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। किताबों, स्कूल ड्रेस और बस फीस के नाम पर अभिभावकों पर बढ़ते आर्थिक बोझ के पीछे एक संगठित “कमिशन सिस्टम” काम करने की बात सामने आ रही है।

जानकारी के अनुसार, स्कूल प्रबंधन, किताब विक्रेता, प्रकाशक और एजेंट के बीच एक तय व्यवस्था के तहत कमीशन का लेन-देन होता है। इस पूरी प्रक्रिया में कुछ प्रभावशाली लोगों की भूमिका भी बताई जा रही है। बताया जाता है कि कई मामलों में 50 फीसदी तक कमीशन पर सौदे होते हैं।

नियमों से हटकर किताबों का चयन

शिक्षा व्यवस्था के तहत स्कूलों में NCERT की किताबें लागू होनी चाहिए, लेकिन कई निजी स्कूल अपने स्तर पर किताबें तय कर रहे हैं। “हेल्पबुक” के नाम पर बाजार में डुप्लीकेट और गाइड बुक्स बेची जा रही हैं, जिनकी गुणवत्ता और प्रमाणिकता पर सवाल उठ रहे हैं।

किताब और ड्रेस में तय कमीशन

सूत्रों के मुताबिक—

प्राथमिक कक्षाओं की किताबों पर करीब 30% तक कमीशन

उच्च कक्षाओं में यह बढ़कर 40% तक

स्कूल ड्रेस पर भी लगभग 30% कमीशन

स्कूल प्रबंधन अक्सर एक ही दुकान से खरीदारी अनिवार्य कर देता है, जिससे अभिभावकों के पास विकल्प नहीं बचता।

बस फीस में भी गड़बड़ी के आरोप

बस फीस को लेकर भी अभिभावकों में नाराजगी है। आरोप है कि साल में सीमित पढ़ाई होने के बावजूद 11 महीने की फीस ली जाती है। बड़ी संख्या में छात्रों से हर महीने करोड़ों रुपये की वसूली होती है, जिसमें से एक हिस्सा ही बस संचालकों को जाता है और बाकी राशि स्कूल प्रबंधन के पास बचती है।

पाइरेटेड किताबों का बढ़ता बाजार

शहर के बाजारों में कई चर्चित विषयों की कथित पाइरेटेड किताबें भी मिल रही हैं, जो असली किताबों की तरह ही दिखती हैं लेकिन आधिकारिक नहीं होतीं।

अभिभावकों की मांग—पारदर्शिता और जांच

लगातार बढ़ते खर्च और अनियमितताओं के आरोपों के बीच अभिभावकों ने सरकार से इस पूरे सिस्टम की जांच और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की है।

एडमिशन सीजन के साथ सामने आने वाली ये समस्याएं शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत को उजागर करती हैं। यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो इसका सीधा असर आम परिवारों की आर्थिक स्थिति और शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ेगा।

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