रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने जमीन विवाद से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि भूमि के कब्जे, अतिक्रमण और पहचान जैसे विवादों का समाधान रिट याचिका के माध्यम से नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में साक्ष्यों की विस्तृत जांच आवश्यक होती है, जिसका निर्णय केवल सक्षम दीवानी अदालत ही कर सकती है।
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट (तत्कालीन SDO, चास) द्वारा 10 अप्रैल 2012 को जारी उस प्रशासनिक आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें एक पक्ष को जमीन का कब्जा दिलाने के लिए पुलिस बल की तैनाती का निर्देश दिया गया था।
याचिकाकर्ता ने अदालत में दावा किया कि उसके पिता ने वर्ष 1979 में पंजीकृत सेल डीड के जरिए आठ डिसमिल जमीन खरीदी थी। जमीन का म्यूटेशन भी हो चुका था और परिवार वर्षों से उस पर शांतिपूर्वक रह रहा था। उसका आरोप था कि SDO ने जांच रिपोर्ट के आधार पर पुलिस की मदद से जमीन का कब्जा दूसरे पक्ष को दिला दिया, जिससे उसे बेदखल होना पड़ा।
हालांकि, हाईकोर्ट ने माना कि यह विवाद पूरी तरह से तथ्य और साक्ष्यों पर आधारित है। ऐसे मामलों में रिट याचिका के बजाय दीवानी अदालत में मुकदमा दायर कर उचित राहत प्राप्त की जानी चाहिए। इसी आधार पर अदालत ने SDO के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका का निपटारा कर दिया।