Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने कर्मचारी अनुशासन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल अनधिकृत अनुपस्थिति के आधार पर किसी कर्मचारी को नौकरी से नहीं हटाया जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि उसने जानबूझकर ड्यूटी से दूरी बनाई थी।
मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति दीपक रोशन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक सहायक शिक्षक के मामले की सुनवाई के दौरान की। शिक्षक अपनी नियुक्ति के कुछ वर्षों बाद गंभीर अवसाद का शिकार हो गया था और इलाज के लिए छुट्टी पर चला गया। उसने अपनी अनुपस्थिति की सूचना विभाग और स्कूल प्रबंधन को रजिस्टर्ड डाक से दी थी।
करीब सात साल तक इलाज कराने के बाद जब डॉक्टरों ने उसे फिट घोषित किया, तो उसने फिर से ड्यूटी ज्वाइन करने की कोशिश की, लेकिन विभाग ने उसे वापस लेने से इनकार कर दिया।
मामला अदालत पहुंचा, जहां पहले सिंगल बेंच ने बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया था। इस फैसले को राज्य सरकार ने खंडपीठ में चुनौती दी। सरकार की ओर से दलील दी गई कि सर्विस कोड के नियम 76 के तहत लंबी अनुपस्थिति पर सेवा समाप्ति उचित है।
हालांकि, अदालत ने जांच रिपोर्ट और परिस्थितियों का मूल्यांकन करते हुए पाया कि शिक्षक की अनुपस्थिति जानबूझकर नहीं थी, बल्कि वह गंभीर मानसिक बीमारी से जूझ रहा था। स्वस्थ होते ही उसने सेवा में लौटने की पहल भी की।
इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी और सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखा। साथ ही सरकार को निर्देश दिया कि मामले पर दोबारा विचार करते हुए बर्खास्तगी या अनिवार्य सेवानिवृत्ति के बजाय कोई हल्की सजा देने पर निर्णय लें।