Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। अदालत ने दिव्यांगता प्रमाणपत्र के प्रारूप से जुड़ी याचिका को जनहित याचिका (PIL) के रूप में दर्ज करने का निर्देश दिया, जबकि यह मामला मूल रूप से सर्विस से संबंधित था।
मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने साफ कहा कि दिव्यांगों के अधिकारों से जुड़े मामलों में तकनीकी आधार पर सुनवाई से इनकार नहीं किया जा सकता।
मामला झारखंड सरकार के 3 अप्रैल 2018 के उस संकल्प से जुड़ा है, जिसमें दिव्यांगता प्रमाणपत्र के लिए एक विशेष प्रारूप को अनिवार्य किया गया था। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह प्रारूप दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम और उसके नियमों के अनुरूप नहीं है।
याचिकाकर्ता ने शुरुआत में व्यक्तिगत रूप से अदालत का दरवाजा खटखटाया था, क्योंकि निर्धारित प्रारूप में प्रमाणपत्र नहीं होने के कारण उन्हें एक भर्ती प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया था। सुनवाई के दौरान झारखंड लोक सेवा आयोग की ओर से यह दलील दी गई कि सर्विस मामलों में आमतौर पर PIL स्वीकार नहीं की जाती।
हालांकि, अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि दिव्यांगों से जुड़े मुद्दों को विशेष संवेदनशीलता के साथ देखने की आवश्यकता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी एक व्यक्ति को संभावित लाभ मिलने के आधार पर व्यापक वर्ग के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
अदालत के इस निर्देश के बाद अब इस मामले की सुनवाई जनहित याचिका के रूप में होगी। यह निर्णय उन हजारों दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए राहत भरा माना जा रहा है, जो जटिल प्रक्रियाओं और प्रमाणपत्र संबंधी बाधाओं के कारण सरकारी नौकरियों के अवसरों से वंचित रह जाते हैं।