नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों तक सीमित है। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई या किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करता है, तो उसका SC दर्जा समाप्त माना जाएगा और वह SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा का दावा नहीं कर सकेगा।
क्या है मामला
यह मामला चिंथाडा आनंद नामक एक पादरी की अपील से जुड़ा है। उन्होंने आंध्र प्रदेश में कुछ लोगों पर जातिगत दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए SC/ST एक्ट के तहत FIR दर्ज कराई थी।
हालांकि, आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने मई 2025 में इस FIR को रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट का कहना था कि ईसाई धर्म अपनाने के बाद आनंद का SC दर्जा समाप्त हो चुका है, इसलिए इस कानून के तहत मामला नहीं बनता।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए आनंद की अपील खारिज कर दी। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि SC का दर्जा कानूनन धर्म से जुड़ा हुआ है और केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायी ही अनुसूचित जाति की श्रेणी में आते हैं।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति अन्य धर्म में धर्म परिवर्तन करता है, तो उसका SC दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है और ऐसे मामलों में SC/ST एक्ट के तहत कार्रवाई का आधार नहीं बनता।
कानूनी आधार
यह प्रावधान संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 पर आधारित है, जिसमें अनुसूचित जातियों की परिभाषा धर्म के आधार पर तय की गई है।
क्या होगा असर
इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को SC से जुड़े आरक्षण और कानूनी संरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। साथ ही, SC/ST एक्ट के तहत दर्ज मामलों में भी उनकी पात्रता प्रभावित हो सकती है।