रांची/हजारीबाग: झारखंड हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्चे की कस्टडी से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बच्चे का कल्याण और सर्वोत्तम हित होता है। इसी आधार पर अदालत ने हजारीबाग फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए करीब साढ़े चार साल की बच्ची की अंतरिम कस्टडी उसकी मां को सौंपने का निर्देश दिया है।
दोनों असिस्टेंट प्रोफेसर, दोनों का था दूसरा विवाह
मामला हजारीबाग स्थित विनोबा भावे विश्वविद्यालय में कार्यरत एक दंपती से जुड़ा है। दोनों पेशे से असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। दोनों ने 16 मई 2017 को शादी की थी और यह दोनों का दूसरा विवाह था। दंपती ने परिवार आगे बढ़ाने के लिए IVF तकनीक का सहारा लिया, जिसके बाद 8 मार्च 2022 को बच्ची का जन्म हुआ।
बाद में पति-पत्नी के बीच विवाद बढ़ गया। मां ने आरोप लगाया कि उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित कर ससुराल से बाहर कर दिया गया और उसके बाद पिता ने उसे अपनी बेटी से मिलने नहीं दिया। वहीं, पिता ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि मां खुद बच्ची को छोड़कर अपनी इच्छा से घर से चली गई थी।
फैमिली कोर्ट ने मां को नहीं दी थी कस्टडी
इस विवाद पर हजारीबाग फैमिली कोर्ट ने मां को बच्ची की कस्टडी देने से इनकार कर दिया था। हालांकि, उसे बच्ची से मिलने का अधिकार दिया गया था। फैमिली कोर्ट का मानना था कि बच्चे के विकास के लिए माता-पिता दोनों का प्यार और स्नेह जरूरी है।
इसके बाद मां ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने कहा- बच्चे का हित सबसे ऊपर
मामले की सुनवाई जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने की। अदालत ने गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट और हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट के प्रावधानों पर विचार करते हुए कहा कि कस्टडी का फैसला केवल माता-पिता के कानूनी अधिकारों के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत के मुताबिक, बच्चे का कल्याण और उसका सर्वोत्तम हित ही कस्टडी तय करने में सबसे अहम कसौटी है।
कम उम्र को देखते हुए मां को मिली अंतरिम कस्टडी
हाईकोर्ट ने बच्ची की कम उम्र को विशेष महत्व दिया। अदालत ने कहा कि करीब साढ़े चार साल की बच्ची अभी इतनी बड़ी नहीं है कि अपने हित में स्वतंत्र रूप से प्राथमिकता तय कर सके। इस उम्र में मां का स्नेह, देखभाल और भावनात्मक जुड़ाव उसके लिए महत्वपूर्ण है। अदालत ने IVF के जरिए बच्ची के जन्म के दौरान मां द्वारा झेले गए शारीरिक और मानसिक कष्ट तथा उसके त्याग को भी मामले के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना।
पिता को भी हर सप्ताह बेटी से मिलने की अनुमति
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मुख्य कस्टडी मामले का अंतिम फैसला आने तक बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को सौंपने का निर्देश दिया। हालांकि, अदालत ने पिता के अधिकारों को भी ध्यान में रखा है। पिता को सप्ताह के अंत में अपनी बेटी से मिलने की अनुमति दी गई है। मुलाकात का समय सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक निर्धारित किया गया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मुलाकात की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे बच्ची की पढ़ाई और रोजमर्रा की दिनचर्या प्रभावित न हो।