फिल्टर वाली दुनिया में सच्चे रिश्तों की तलाश, ‘दो दीवाने शहर में’ ने जीता दिल

Mahak Kumari
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Ranchi: महानगरों की चकाचौंध और सोशल मीडिया के फिल्टर वाले दौर में जहां हर रिश्ता परफेक्ट दिखने की होड़ में है, वहीं आज रिलीज हुई फिल्म Do Deewane Seher Mein एक अलग रास्ता चुनती है। निर्देशक Ravi Udyawar की यह रोमांटिक ड्रामा फिल्म दिखावे से परे, अधूरे और असुरक्षित लोगों की सच्ची भावनाओं को पर्दे पर उतारती है।

फिल्म में Siddhant Chaturvedi और Mrunal Thakur मुख्य भूमिकाओं में हैं। कहानी मुंबई जैसे व्यस्त शहर में रहने वाले दो युवाओं—शशांक और रोशनी—के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों अपने-अपने कॉम्प्लेक्स और असुरक्षाओं से जूझ रहे हैं। शशांक एक कॉरपोरेट प्रोफेशनल है, लेकिन बोलने में हल्की परेशानी उसके आत्मविश्वास को प्रभावित करती है। वहीं रोशनी एक सफल मीडिया प्रोफेशनल होते हुए भी अपने लुक्स को लेकर असहज रहती है।

परिवार के शादी के दबाव और अंदरूनी डर के बीच दोनों की मुलाकात होती है। फिल्म यह सवाल उठाती है कि जब इंसान खुद को स्वीकार नहीं कर पाता, तो क्या वह किसी और का प्यार स्वीकार कर सकता है? कहानी इसी आत्मस्वीकृति की यात्रा को बेहद सादगी से दिखाती है।

अभिनय बना सबसे मजबूत पक्ष

सिद्धांत चतुर्वेदी ने शशांक के किरदार में संयम और संवेदनशीलता दिखाई है। उन्होंने अपने किरदार की कमजोरी को ओवरड्रामैटिक बनाने के बजाय उसे बेहद नैचुरल अंदाज में पेश किया। वहीं मृणाल ठाकुर ने रोशनी के बाहरी आत्मविश्वास और भीतर की असुरक्षा को प्रभावी ढंग से उभारा है। दोनों की केमिस्ट्री फिल्म को विश्वसनीय बनाती है।
सहायक भूमिकाओं में संदीपा धर और इला अरुण ने भी कहानी में भावनात्मक गहराई जोड़ी है।

निर्देशन और प्रस्तुति

फिल्म में मुंबई को केवल लोकेशन नहीं, बल्कि एक किरदार की तरह दिखाया गया है। लोकल ट्रेनों की भीड़, ट्रैफिक और भागती जिंदगी के बीच दो लोगों का ठहराव फिल्म का भावनात्मक आधार बनता है। सिनेमैटोग्राफी और बैकग्राउंड म्यूजिक कहानी के मूड को मजबूती देते हैं।

हालांकि फिल्म की रफ्तार कुछ जगहों पर धीमी पड़ती है, खासकर सेकेंड हाफ में। कहानी का अंत काफी हद तक अनुमानित लगता है और कुछ सहायक किरदारों को ज्यादा विस्तार नहीं मिल पाया।

फाइनल वर्डिक्ट

‘दो दीवाने शहर में’ एक स्लाइस-ऑफ-लाइफ रोमांटिक ड्रामा है, जो बताती है कि सच्चा प्यार परफेक्शन नहीं, स्वीकार्यता मांगता है। यह फिल्म खास तौर पर उन युवाओं से जुड़ती है जो खुद को लेकर असुरक्षित महसूस करते हैं।
तकनीकी कमियों के बावजूद, सिद्धांत और मृणाल की सशक्त अदाकारी और ईमानदार कहानी इसे एक बार थिएटर में देखने लायक बनाती है।

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